Wednesday, December 15, 2010

राजस्थान से मोल पानी लाने की लाचारी,* राजस्थान सीमा से सटे दर्जनों गांवों में पानी ने लोगों को रुलाया

* सिंचाई के अभाव में गेहूं के उत्पादन पर पड़ेगा असर, ताल सूखे, नहरों में नहीं पानी सिरसा : राजस्थान की सीमा से सटा हुआ गांव है गुसाईंआना। बरानी जमीन की तपती रेत पर इस गांव का साठ वर्षीय बुजुर्ग रामस्वरूप तेजी से ऊंट गाड़ी दौड़ा रहा है। तेजी इसलिए है कि कहीं वह नहर में से पानी लाने में पीछे न रह जाए। इसीलिए करीब दर्जनभर ड्रम ऊंट गाड़ी पर रखकर रामस्वरूप तेजी से नहर की ओर जा रहा है। तेजी इसलिए भी है कि नहर में करीब ब्यालिस दिन बाद पानी आया है और वो भी बहुत कम। पीने के लिए काम चल जाए, यही बहुत है, फसल की काश्त एवं पकी हुई फसल को सिंचित करना यहां के लोगों को नामुमकिन सा लगता है। यह स्थिति केवल गुसाईंआना गांव की नहीं। राजस्थान की सीमा से सटे जोगीवाला, खेड़ी, कुम्हारिया, कर्मशाना, धोलपालिया, नीमला जैसे दर्जनों गांवों में है। पिछले करीब डेढ़ माह से यहां पानी को लेकर त्राहिमाम का आलम है। ताल सूखे है, नहरों में पानी नहीं है, पुराने कुएं भी सूख गए हैं। ऐसे में बिन पानी के लोगों का हलक सूख गया है। हालात यह है कि यहां के लोग राजस्थान के बोर्डर पर स्थित गांवों से मोल पानी लाने को विवश हैं। गांव खेड़ी के गांव चोड़ी के कृष्ण कुमार 'राजस्थान बॉर्डर पर खिंचवाणे गाम मूं 300 तई लेगे 600 रुपए में पाणी को कैंटर ल्याया।Ó से जाहिर होता है कि इलाके में पेयजल की कितनी किल्लत है। दरअसल मौसम का मिजाज अभी गर्म हुआ है। अभी पारा 38 डिग्री के करीब है। इस समय गेहूं की फसल पकी हुई है। जिला में करीब 107 नहरें हैं। सौ से अधिक नलकूप आधारित पेयजलापूॢत के केंद्र गांवों में स्थापित हैं। अधिकांश जलघर नहरों पर आधारित हैं। नहरों में इन दिनों चार गु्रपों में बारीबंदी के लिहाज से पानी छोड़ा जा रहा है। करीब 60 से अधिक नहरें इस समय सूखी हैं। एक बार बारबंदी होती है तो 42 दिन के बाद नहर में पानी आता है। ऐसे में किसान अपनी फसल को ङ्क्षसचित नहीं कर पाए। गांव खेड़ी के फूसाराम, लालचंद, काशीराम कहते हैं कि औसतन एक एकड़ में अक्सर 50 मण तक गेहूं का उत्पादन होता है। इस बार नहरों में पानी नहीं रहा। इसलिए अंतिम चरण में फसल को ङ्क्षसचित न कर सके। इलाके में भूजल 500 फीट पर पहुंच गया है और भूजल खारा है। ऐसे में किसान कुछ न कर सके। किसानों ने बताया कि इस बार 20 से 25 मण प्रति एकड़ ही उत्पादन होगा। इसी तरह से गांव गुसाईंआना के रामस्वरूप, राकेश बताते हैं कि पिछले एक माह से पानी की इतनी किल्लत है कि राजस्थान इलाके से पानी मोल खरीदकर लाने को लाचार हैं। कर्मशाना, धोलपालिया, नीमला एवं कुम्हारिया गांव में भी ऐसे ही हालात हैं। गांव कुम्हारिया में एक चौक पर गांव के लोग ताश खेलते मिले। खेतिहर लिहाज से काम के इन दिनों में ताश खेलने का कारण पूछा तो ग्रामीण ठेठ भाषा में हंसते हुए बोले 'पीण गो तो पाणी कोनी, बिजाई कूकर करां, बिजाई खातर पाणी कोनी अर इह खातर बेला हां, जदी तो अठे बैठेया ताश गी काट पर काट मारण लाग्रय हां।Ó गहरी पैठ से देखें तो इस बार जिला में दो लाख 75 हजार हैक्टेयर में गेहूं की काश्त हुई। गेहूं की बिजाई के समय से ही जिला में नहरी पानी की किल्लत है। भाखड़ा से निर्धारित पानी से करीब 30 फीसदी पानी कम मिल रहा है। ऐसे में उत्पादन पर असर पडऩा लाजिमी है। इन दिनों नहरों में 42 दिन बाद पानी छोड़ा जा रहा है और यह पानी भी महज जलघरों में पेयजलापूॢत के लिए। ङ्क्षसचाई के लिए इस पानी के प्रयोग पर एक प्रकार से मनाही है। गांव कुम्हारिया के लोगों ने बताया कि दो दिन पहले नहर में 40 दिन बाद पानी आया। पानी को पूरी तरह से रोककर मोगे लगाकर पहले जोहड़ भरा, ताकि पेयजल का प्रबंध हो सके। बिजाई के लिए तो यह पानी अलबत्ता पर्याप्त नहीं है और दूसरा इसे ङ्क्षसचाई के लिए प्रयेाग पर मनाही भी है। गांव के लोगों ने बताया कि पिछले करीब डेढ़ माह में जोगीवाला, कुम्हारिया, खेड़ी एवं गुसाईंआना गांवों में लोगों ने पानी मोल खरीदा और इस पर एक प्रकार से लाखों रुपए खर्च डाले। यहां के लोग सिरसा के निकट स्थित गांव नेजिया या राजस्थान के ङ्क्षखचवाणा गांव से मोल पानी खरीद रहे हैं। जाहिर है कि पेयजल को लेकर मारामारी का आलम है और अभी गर्मी का मौसम शुरू हुआ है। पेयजल किल्ल्त एक जगह है और दूसरी दिक्कत इस बार फसल को पर्याप्त ङ्क्षसचाई न मिलने से गेहूं के उत्पादन पर भी निश्चित रूप से असर पड़ेगा। महकमा भी ङ्क्षचता में दरअसल नहरी पानी की किल्लत के चलते पेयजलापूॢत की जिम्मेदारी संभालने वाला जलदाय महकमा भी ङ्क्षचता में है। जलदाय महकमा डिवीजन दो के कार्यकारी अभियंता विक्रम ङ्क्षसह भी मानते हैं कि राजस्थान के साथ लगते गांवों में बड़ी दिक्कत है। वे बताते हैं कि डिवजीन दो में 176 गांव हैं, जिनमें से 145 के करीब कैनाल बेसड जबकि 22 नलकूप आधारित पेयजल केंद्र हैं। जाहिर है कि नहरी आधारित 145 जलघर हैँ और ऐसे में नहरों में पानी न होने से जलघरों की डिग्गियां सूखना भी स्वाभाविक सी बात है। कार्यकारी अभियंता ने बताया कि टेल पर जो गांव पड़ते हैं, वहां लिफ्टिंग के जरिए पानी ले जाया जा रहा है ताकि पेयजलापूॢत की जा सके। उन्होंने माना कि परेशानी तो है, लेकिन विभाग दिक्कत दूर करने को लेकर शिद्दत के साथ कदम उठा रहा है। राजस्थान कैनाल से आता है पानी जहां राजस्थान सीमा से सटे गांवों के लोग पानी मोल खरीद रहे हैं, वहीं गहरी पैठ से देखने पर यह भी पता चलता है कि राज्य के बहुत से गांवों में राजस्थान के जरिए पेयजलापूॢत होती है। ऐलनाबाद इलाके के गांव बचेर, धोलपालिया, बेहरवाला, नीमला एवं काशी का बास राजस्थान से सटे हुए हैं और ये गांव टेल पर पड़ते हैं। इन गांवों में जलघर हैं, लेकिन नहरी पानी नहीं पहुंचता है। ऐसे में जलदाय महकमा यहां पर राजस्थान कैनाल के जरिए पानी की लिफ्टिंग कराता है। अलबत्ता राजस्थान कैनाल में भी इस समय पर्याप्त पानी नहीं है। ऐसे में सीमा पर सटे इन गांवों की परेशानी अभी भी दूर नहीं हुई है। Sandeep Bhurtana

No comments: